शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

मी तुला अर्पण करून जाईल


मी माझे सर्वस्व तुला अर्पण करून निरोप घेईल

मुलांनो, मी  माझी विनम्रता गिळंकृत केली आहे
मी माझी बनावट संपत्ती तुम्हाला वारस 
ठेऊन जात आहे

मी विशेषज्ञ आहे
मी गांभीर्य पांघरून फिरत आहे
मला प्रत्येक भेटणारा माणूस मूर्ख वाटतो
मी  ही मुर्खता तुला स्वाधीन करून जात आहे

मी तुला माझे भरजरी वस्त्र,
भाषा वैभव
आणि माझा अहंकार
तुला अर्पण करून निरोप घेईल

मी कचरा पेटीत फेकून दिली आहे
सारी सहजता आणि तरलता
मी गंभीर राहील त्या क्षणा पर्यंत
जो पर्यंत माझा सन्मान होत राहील

जरा कुठे माझ्या विरोधात सूर निघतील
तेव्हा पहा माझी मानसिकता, वाचिकता
आणि शारीरिक हिंसा

माझ्या आत हिंस्त्र पशु आहे व
बाहेर एक आदर्श पुरुष आहे,
माझ्या मुलांनो तुम्हाला
 अर्पण करील माझा  हा दुटप्पीपणा

मी छता वरून लाँच झालेले 
रॉकेट आहे
का मोडक्या झोपडीतून
हवेत फेकलेला भाला आहे,
मी काय होतो या पेक्षा
जास्त महत्वाचे आहे की
मी काय झालो आहे,
जे काही असेल ते
 अर्पण करून निरोप घेईल

गल्लीत बलात्कार असो, दंगल असो
 मी तुला माझा शेळपटपणा अर्पण करून
शिकवून जाईल 
कसे शेपूट घालून
दार खिडकी बंद करून घरात राहावे,

शेजारील घरात गरीब मुले भुकेने मरत आहेत
तू मात्र गिळत रहा पुरी भजे, सुका मेवा
मी तुला ही अव्वल निष्ठुरता
अर्पण करून निरोप घेईल

तुला पाऊले पाऊले दिसतील
अर्धनग्न मळकट पिचलेली
असंख्य बालके आणि बाया
तू त्याकडे दुर्लक्ष करीत
तुझी किमती बनारस साडी
आणि पॅन्ट सावरीत
अलगद निघून जा
मी तुला ही महान बेफिकीर
 निर्लज्ज-परंपरा अर्पण करून निरोप घेईल

माझे साहित्य जगात वाचले जाते
अनेक भाषेत माझ्या पुस्तकांचा
अनुवाद झाला आहे
या अहंकाराच्या दुनियेत फुगून जाईल
आणि हीच हवा तुझ्या डोक्यात भरून
मी तुझा निरोप घेईल

माझे जे जे काही आहे
ते ते तुला अर्पण करून
तुमचा निरोप घेईल

   मूळ हिंदी कविता-
  ~अनामिका अनु
मराठी अनुवाद- विजय नगरकर

********
मूल हिंदी कविता

मैं अपना सबकुछ तुम्हें दे कर जाऊँगा 

बच्चों मैं पूरी विनम्रता खा चुका हूँ 
मैं  तुम्हें बनावटीपन विरासत में देकर जाऊँगा 

मैं विशेषज्ञ हूँ
मैं गंभीर अहं को पहन कर निकलता हूँ
बेवकूफ़ लगता हैं मुझे हर दूसरा व्यक्ति 
मैं यही बेवकूफ़ी तुम्हें देकर जाऊँगा 

मैं अपने बढ़िया कपड़े,
भाषा पर पकड़
और अपनी अकड़ दे कर जाऊँगा 

 मैंने डस्टबीन में फेंक दी है सारी सहजता, सरलता 
और तरलता
मैं तब तक ही  गंभीर रहूँगा
जब तक मेरा सम्मान होगा ।
 ज़रा सी ठेस पहुँचायी किसी ने
तब देखना मेरी मानसिक,वाचिक और शारीरिक हिंसा
मैं  भीतर से पशु ,बाहर से सलीकेदार आदमी हूँ
मैं   देकर जाऊँगा यह दोहरापन तुमको ,मेरे बच्चे!

मैं  छत पर से लान्च हुआ रॉकेट हूँ
या टूटी झोपड़ी से फेंका भाला!
क्या था ,से ज़्यादा महत्वपूर्ण है
क्या बना मैं !
जो बना वह देकर जाऊंँगा

गली में रेप, लूट, दंगा होगा
खिड़की लगाकर दुबकना सीखा दूँगा
मैं तुम्हें अपनी पूरी कायरता दे कर जाऊँगा

बगल में  मर जाएँगे भूखे बच्चे
तुम चबाते रहना पूरी भुजिया और सूखे मेवे
मैं  तुम्हें वह अव्वल दर्जे की निष्ठुरता देकर जाऊँगा

नग्न, मैली, कुचली औरतें और बच्चे कई बार दिखेंगे-देखेंगे तुमको
तुम अनदेखा कर ठीक करना अपनी बनारसी और पतलून
मैं वह महान निर्लज्ज निष्फ़िक्र परंपरा तुमको देकर जाऊँगा । 

मैं दुनिया भर में पढ़ा जाता हूँ 
कई भाषा में अनुवाद हुआ है मेरे कहे लिखे का,
इसी गुमान में  जीवन भर फूला रहा हूँ मैं
और तुम में यही ग़ुबार भर कर जाऊँगा

मेरा जो कुछ भी है
तुम्हें देकर जाऊँगा! 
 
~  अनामिका अनु

Anamika Anu 


बुधवार, 10 जून 2020

''जन्म से पहले एक प्रार्थना''

''जन्म से पहले एक प्रार्थना''

क्या आप सुन रहे हो?
मैं अभी जन्मा नहीं हूँ

मुझे बचाओ
रक्तपिपासु पिशाचों से
चूहे से, नेवले से तथा
खूंखार दरिंदों से

मैं अभी तक जन्मा नहीं हूँ
मुझे बचा लो
मुझे डर है कि
यह मानव जाति
अपनी रहस्यमयी दुनिया में
मुझे कुचलकर खामोशी से मिटा देगी

मुझे गहरे नशे में डुबो कर
 झूठे सपनों से
मुझे बहकाएगी ।
अपने स्वार्थ की बलिवेदी पर
रक्तरंजित कर देगी ।

मैं अभी जन्मा नहीं हूँ
मुझे पानी में छपाछप करने दो
मुझे खुशी से उछलने दो 
माँ की दुब में बढ़ने दो 
पेड़ों को मुझसे बात करने दो
मेरे लिए आकाश को गीत गाने दो

पंछियों और सुबह की धूप को आने दो 
मेरे मन के भीतर रास्ता दिखाने ।

मैं अभी जन्मा नहीं हूँ
मुझे माफ़ करना
मेरे पाप इस दुनिया में
 खड़े हो जाएंगे
वे मेरे शब्द बनकर मेरे सामने बोलेंगे
वे वही सोचेंगे जो मेरे विचार होंगे
मेरे गद्दार विरोधी मेरे पीछे राजद्रोह  करेंगे मेरे पीठ पीछे वार करेंगे
वे मेरे ही हाथों से मेरा जीवन
 समाप्त करेंगे,
मेरे मृत्यु  समाधी  पर
उनका जीवन लहलहायेगा

मैं अभी जन्मा नहीं हूं
मुझे मेरे नाटक के अंक में
रिहर्सल  करने दो,
मुझे कोई संकेत मिलेगा, 
जब वह बूढें सयाने मुझे पढ़ाने लगेंगे
जब  सत्ता  मुझे सताने लगेगी
जब  कोई  उत्तुंग पहाड़  
मुझे भयाक्रांत करेगा,
जब प्रेमी मुझ पर हंसेंगे
रुपहले बादल मुझे मूर्ख बनाएंगे,
जब रेत की आंधी कयामत बरपाएगी
जब कोई याचक मेरा दान ठुकरायेगा
और मेरे बच्चे मुझे धिक्कारेंगे,

मैं अभी जन्मा नहीं हूँ
क्या आप सुन रहे हो?
मेरे पास उस आदमी को
मत आने देना
जो अपने आप को
शैतान या ईश्वर समझता है

मैं अभी जन्मा नहीं हूँ
मुझे शक्ति देना
जिससे मैं संघर्ष करूंगा,
जो मेरी मानवता को 
निष्क्रिय कर देना चाहता है
जो मुझे भयंकर पत्थर दिल 
मानव में ढालना चाहता है,
जो मुझे एक मशीन का दांता बनाएगा
जो चेहरे पर एक मासूम सी अदा लेकर
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को नष्ट करेगा
एक प्रहार करके
मुझे चूर चूर करेगा
जैसे अंजुली का पानी छलक जाए

उनको मुझे पत्थर बनाने मत देना
या न ही छलकने देना
 यह न कर पाओ तो
 मुझे नष्ट कर देना
****

अनुवाद- विजय नगरकर
vpnagarkar@gmail.com
09657774990

मूल अंग्रेजी कविता-  'Prayer before birth'
 Poet -. Louis MacNeice

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

बलराज साहनी का हिंदी प्रेम

टैगोर ने कहा पंजाबी में लिखो, बलराज साहनी ने कहा हिन्दी देश की भाषा
बलराज साहनी 
(बलराज साहनी प्रतिबद्ध अभिनेता भर नहीं रहे, लेखक और चिंतक भी रहे. इप्टा के साथ ही वे प्रगतिशील लेखक मंच से भी जुड़े रहे. यहां हम उनके एक काफ़ी लम्बे पत्र का एक अंश छाप रहे हैं, जो उन्होंने सन् 1970 के आसपास लिखा था. उस दौर की हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं ने जब उनका यह ख़त नहीं छापा तो उन्होंने इसे पैम्फ़लेट की शक़्ल में छपाकर अपने कुछ लेखक दोस्तो के पास भेजा था. उस दौर में जब वह बाक़ायदा फ़िल्मों से वाबस्ता थे, भाषा और साम्प्रदायिकता के सवालों से भी जूझ रहे थे. उनके नज़रिये और फ़िक्र को इस ख़त से समझा जा सकता है.)
कभी मेरा भी नाम हिन्दी लेखकों में गिना जाता था. मेरी कहानियां अपने समय की प्रमुख पत्रिकाओं – विशाल भारत, हंस आदि में – नियमित रूप से प्रकाशित हुआ करती थीं. बच्चन, अज्ञेय, अमृतलाल नागर, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, उपेंद्रनाथ अश्क – सब मेरे समकालीन लेखक और प्रिय मित्र हैं.
मेरी शुरू की जवानी का समय था वह – बहुत ही प्यारा, बहुत हसीन. मैंने कुछ समय शांतिनिकेतन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के पास और कुछ समय सेवाग्राम में गांधी जी के चरणों में बिताया. मेरा जीवन बहुत समृद्ध बना. शांतिनिकेतन में मैं हिन्दी विभाग में काम करता था. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेरे अध्यक्ष थे. उनकी छत्रछाया में हिन्दी जगत के साथ मेरा सम्बन्ध दिन-प्रतिदिन गहरा होता गया. सन् 1939 के अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन में वे मुझे भी अपने संग प्रतिनिधि बनाकर बनारस ले गए थे, और वहां मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बनारसीदास चतुर्वेदी, निराला और साहित्य के अन्य कितने ही महारथियों से मिलने और उनके विचार सुनने-जानने का मुझे गौरव प्राप्त हुआ.
यद्यपि आजकल मैं हिन्दी में नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा पंजाबी में लिखता हूं, फिर भी आप लोगों से ख़ुद को अलग नहीं समझता. आज भी मैं हिन्दी फ़िल्मों में काम करता हूं, हिन्दी-उर्दू रंगमंच से भी मेरा अटूट सम्बन्ध रहा है. ये चीज़ें, अगर साहित्य का हिस्सा नहीं तो उसकी निकटवर्ती ज़रूर हैं.
हिन्दी हमारे देश की एक विशेष और महत्वपूर्ण भाषा है. इसके साथ हमारी राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता का सवाल जुड़ा है. और इस दिशा में, अपनी अनेक बुराइयों के बावजूद, हिन्दी फ़िल्में अच्छा रोल अदा कर रही हैं.
लेकिन इस असलियत की ओर से भी आंखें बंद नहीं की जा सकतीं कि हिन्दी, कई दृष्टियों से, अपने क्षेत्र में और उससे बाहर भी कई प्रकार से साम्प्रदायिक और प्रांतीय बैर-विरोध और झगड़े-झमेले का कारण बनी हुई है. कई बार तो डर लगने लगता है कि कहीं एकता के लिए रास्ते साफ़ करने के बजाय वह उन रास्तों पर कांटे तो नहीं बिछा रही, जो हमें उन्नति और विकास के बजाय अधोगति और विनाश की ओर ले जाना चाहती है, जो हमारे पांव में फिर से साम्राज्यवादी ग़ुलामी की बेड़ियां पहनाना चाहती हैं.
उर्दू कन्वेंशन
पिछले साल, दिसम्बर में, बम्बई में एक उर्दू-कन्वेंशन बुलाई गई थी, जिसके सूत्रधार, डॉ. मुल्कराज आनंद. कृष्ण चंदर, सज्जाद जहीर, राजेंद्र सिंह बेदी और अली सरदार जाफ़री जैसे प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक थे. मैं उस समय बंबई में नहीं था, सो मुझे इस बात की ज़्यादा जानकारी नहीं है कि कन्वेंशन में क्या कुछ हुआ. लेकिन जब मैं वापस आया तो यह सुनकर बेहद हैरानी हुई कि हिन्दी का एक भी प्रगतिशील लेखक इस कन्वेंशन में शामिल नहीं हुआ था. ऐसे लगा, जैसे हिन्दी-उर्दू के सवाल पर प्रगतिशील लेखक संघ का, अन्दर-ही-अन्दर, उसी प्रकार बँटवारा हो चुका है, जैसे हिन्दू-मुस्लिम सवाल पर हिन्दुस्तान का बँटवारा हो चुका है. मुझे बहुत गहरी निराशा हुई.
साथ ही, इस बात पर सख़्त हैरानी भी हुई कि कन्वेंशन की प्रौढ़ता बनाने के लिए सिक्ख युवकों का एक काफी बड़ा जत्था भी बंबई आया हुआ था, हालांकि हर कोई इस बात को जानता है कि उर्दू वाले कल तक उर्दू को ही पंजाब की भाषा मानते थे, और पंजाबी की उपभाषा का दर्जा देते थे. अनायास ही मेरे मन में एक मलिन-सा संशय उठा कि कहीँ उर्दू को अल्पसख्यंकों की भाषा क़रार देकर उसकी रक्षा के लिए अल्पसंख्यक जातियों को तो नहीं उकसाया जा रहा. कहीं उर्दू की रक्षा करने के लिए पंजाबी को केवल सिक्खों को भाषा तो नहीं बनना पड़ रहा? मन में यह घटिया विचार उठने पर मैंने ख़ुद को फटकारा. बेशक, पंजाबी साहित्य के क्षेत्र में इस समय सिक्ख लेखक ही अधिक संख्या में हैं, लेकिन पंजाबी को सिक्खों की भाषा मानने का दावा कभी किसी ने नहीं किया. फिर, देश के इतने बड़े प्रगतिशील, मार्क्सवादी विद्वानों से कभी सपने में भी आशा नहीं की जा सकती कि ये भाषा की समस्या को साम्प्रदायिक राजनीति से जोड़ेंगे. लेकिन फिर भी रह-रह कर चिन्ता घेर लेती थी. एक बार पहले मेरा वतन पंजाब साम्प्रदायिक राजनीति की छुरी के नीचे अपना सिर दे चुका था और लाखों लोगों को व्यर्थ में क़ुर्बान होना पड़ा था. कहीँ क़िस्मत एक और बरबादी की शुरूआत तो नहीं कर रही, और यह सोचकर मीठी नींद लेते रहे थे कि ‘ऐसे भला कैसे हो सकता है?’
बाद में, नयी कहानियां में अमृतराय के दो सम्पादकीय लेख छपे. उसी पत्रिका में यशपाल, अमृतलाल नागर और नरेंद्र शर्मा आदि द्वारा उर्दू-कन्वेंशन सम्बन्धी दिए गए वक्तव्यों को पढ़कर मेरी चिन्ता और बढ़ी. फिर उपलब्धि नामक पत्रिका का एक पूरा अंक इस कन्वेंशन के लिए अर्पित किया गया देखा, जिसमें डा.धर्मवीर और अन्य कई लेखकों के विचार पढ़ने को मिले. धर्मयुग में प्रकाशित टीका-टिप्पणियाँ भी देखीं. मुझे लगा कि मानसिक अशान्ति केवल मेरे तक ही सीमित नहीं थी.
और आज यही मानसिक अशान्ति मुझे मजबूर कर रही है कि आपके सामने अपना दिल खोलूँ, अपने जीवन के कुछ अनुभव और विचार पेश करूं. मैं जानता हूं कि आप देश की भलाई, एकता और प्रगति के इच्छुक हैं, और आशा करता हूं कि जो कुछ अच्छा-बुरा मैं कहूंगा, उसे पूरी सद्भावना से परखेंगे. अगर मेरे मुँह ने कोई बुरी या नाजायज़ बात भी निकल जाए, तो मुझे अपना भाई या साथी समझकर माफ़ कर देंगे.
अब मैं अपनी बात पर आऊं,
भाषा सम्बन्धी अनुभव
मैं जब शांतिनिकेतन में था, तो गुरुदेव टैगोर मुझे बार-बार कहा करते थे, ‘तुम पंजाबी हो, पंजाबी में क्यों नहीं लिखते. तुम्हारा उद्देश्य होना चाहिए कि अपने प्रांत में जाकर वही कुछ करो, जो हम यहां कर रहे हैं.’
मैंने जवाब में कहा, हिन्दी हमारे देश की भाषा है. हिन्दी में लिखकर मैं देश भर के पाठकों तक पहुंच सकता हूँ.
वे हंस देते, और कहते, ‘मैं तो केवल एक प्रांत की भाषा में ही लिखता हूँ, लेकिन मेरी रचनाओं को सारा भारत ही नहीं, सारा संसार पढ़ता है. पाठकों की संख्या भाषा पर निर्भर नहीं करती.’
मैं उनकी बातें एक कान से सुनता और दूसरे कान से निकाल देता. बचपन से ही मेरे मन में यह धारणा पक्की हो चुकी थी कि हिन्दी पंजाबी के मुक़ाबले कहीं ऊंची और सभ्य भाषा है. वह एक प्रांत की नहीं, बल्कि सारे देश की राष्ट्रीय भाषा है (उन दिनों देश सम्बन्धी मेरा ज्ञान उत्तरी भारत तक ही सीमित था).
एक दिन गुरुदेव ने जब फिर वही बात छेड़ी तो मैंने चिढ़कर कहा, ‘पता नहीं क्यों, आप मुझे यहां से निकालने पर तुले हुए हैं. मेरी कहानियां हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिकाओं में छप रही हैं. पढ़ाने का काम भी मैं चाव से करता हूं. अगर यक़ीन न हो तो मेरे विद्यार्थियों से पूछ लीजिए. जिस प्रेरणादायक वातावरण की मुझे ज़रूरत थी, वह मुझे प्राप्त है. आख़िर मैं यहाँ से क्यों चला जाऊं?’
उन्होंने कहा, ‘विश्व भारती का आदर्श है कि साहित्यकार और कलाकार यहाँ से प्रेरणा लेकर अपने-अपने प्रांतों में जाएं और अपनी भाषाओं और संस्कृतियों का विकास करें तभी देश की सभ्यता और संस्कृति का भंडार भरपूर होगा.’
‘आपको पंजाबी भाषा और संस्कृति के बारे में ग़लतफ़हमी है,’ मैंने कहा, ‘हिन्दुस्तान से अलग कोई पंजाबी संस्कृति नहीं है. पंजाबी भाषा भी वास्तव में हिन्दी की एक उपभाषा है. उसमें सिक्ख-धर्मग्रंथों के अलावा और कोई साहित्य नहीं है.’
गुरुदेव चिढ़ गए. कहने लगे, ‘जिस भाषा में नानक जैसे महान कवि ने लिखा है, तुम कहते हो उसमें कोई साहित्य नहीं है.’
और जब मैंने अपने जीवन ये पहली बार उनके मुख से गुरु नानक की ये पक्तियाँ सुनी:
गगन में थाल रवि चंद दीपक बने
तारक मंडल जनक मोती
धूप मलयानलो पवन चंवरो करे
सगल वनराय फूलंत जोती ।…
और अगर मुझे याद धोखा नहीं देती, तो गुरुदेव ने साथ में यह भी कहा था, ’कबीर की वाणी का अनुवाद मैंने बंगाली ने किया है, लेकिन नानक की वाणी का अनुवाद का साहस नहीं हुआ. मुझे डर था कि मैं उनके साथ इंसाफ नहीं कर सकूंगा.’
उसी शाम आचार्य क्षितिमोहन सेन के साथ नंगे पाँवों लम्बी सैर पर जाने का मौका मिला, जो भक्तिकाल सम्बन्धी सर्वोच्च खोजी और विद्वान माने जाते हैं. जब उनसे गुरुदेव के साथ हुई बातचीत का ज़िक्र छिड़ा, तो अचानक उनके मुँह से निकला, ‘पराई भाषा में लिखने वाला लेखक वेश्या के समान है. वेश्या धन-दौलत, मशहूरी और ऐशइशरत भरा घरबार सब कुछ प्राप्त कर सकती है, लेकिन एक गृहिणी नहीं कहला सकती.’
मैं मन ही मन बहुत खीझा. बंगाली लोग प्रांतीय संकीर्णता के लिए प्रसिद्ध थे. लेकिन टैगोर और क्षितिमोहन जैसे व्यक्ति भी उसका शिकार होंगे, यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी.
गाँधी जी के विचार
फिर मुझे एक और धक्का लगा. शांतिनिकेतन से मुझे कुछ समय के लिए ’बुनियादी तालीम’ संस्था की पुस्तकें अनुवाद करने के लिए सेवाग्राम जाना पड़ा. वहाँ गाँधी जी को निकट से देखने का मौक़ा मिला. और यह देखकर हैरानी हुई कि वे अपना अधिकांश लेखन-कार्य गुजराती में करते थे. गाँधी जी पर मैं प्रांतीय मनोवृत्ति का दोष कैसे लगा सकता था, जबकि वे हमारी राष्ट्रीय चेतना के जन्मदाता थे? राष्ट्रभाषा ‘हिन्दी-हिन्दुस्तानी’ सबसे बड़ा प्रकाश-केंद्र भी तो वही थे. फिर, वे राष्ट्रभाषा को छोड़कर अपनी प्रांतीय भाषा में क्यों लिखते थे?
इस बारे में एक दिन मैं उनसे पूछ ही बैठा. मेरा सवाल सुनकर ये भोंचक्के रह गए, जैसे सोचने लगे हों कि कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति ऐसा बचकाना सवाल कैसे पूछ सकता है. आख़िर उन्होंने कहा, मातृभाषा तो मां के दूध जैसी मीठी होती है. राष्ट्रभाषा का मनोरथ प्रांतीय भाषाओं को ख़त्म करना नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करना है, उन्हें एक-दूसरे के निकट लाना और प्रेमसूत्र में पिरोना है.
मैं फिर भी न समझ सका. मेरे दिमाग़ में कई सवाल उठ रहे थे. गाँधी जी हिन्दी-हिन्दुस्तानी को एक सीधी-सादी और आम बोलचाल की भाषा तक सीमित रखना चाहते थे, जिसमें न तो मोटे-मोटे फ़ारसी शब्दों का प्रयोग हो, न ही बड़े-बड़े संस्कृत शब्दों का. इसके लिए वे लिपियां भी दो चाहते थे –देवनागरी और फ़ारसी. ये दोनों बातें ही मुझे अव्यावहारिक लगती थीं. हिन्दी को किस हद तक, कब तक और क्यों केवल आम बोलचाल की भाषा रखा जाएगा? उसके विकास पर क्यों बंधन लगाए जाएंगे, जबकि वे बंधन प्रांतीय भाषाओँ पर नहीं लगाए जाते. राष्ट्रभाषा को तो प्रांतीय भाषाओं की अपेक्षा कहीं अधिक समृद्ध बनाना चाहिए. और एक भाषा के लिए दो लिपियों को परवान करना कहाँ की अक्लमंदी है?
मुझे याद है, इस समस्या के बारे में उन दिनों मेरे मन में निरन्तर उथल-पुथल मची रहती थी. मैं मौक़ा ढूँढता रहता कि कब गांधी जी के साथ दोबारा इस बारे में बातचीत करूँ. लेकिन वह मौक़ा न मिला. दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था, और गाँधी जी राजनीतिक मामलों में बहुत ज्यादा उलझ गए थे.
एक दिन उन्हें मिलने के लिए ऑल इंडिया रेडियो के अंग्रेज़ डायरेक्टर-जनरल, मिस्टर लाइनल फील्डन, वहां आए. वे हिन्दुस्तान से इस्तीफ़ा देकर लंदन के बी.बी.सी. में हिन्दुस्तानी विभाग खोलने के लिए जा रहे थे. वे अपने तुरन्त और हंगामी फ़ैसलों के लिए अद्वितीय थे. वे आए थे गाँधी जी को अलविदा कहने, लेकिन जाते समय मुझे अपने साथ रेडियो अनाउन्सर के रूप में लंदन ले गए.
लंदन में
उस ज़माने में, रेडियो पर उर्दू का वैसा ही बोलबाला था, जैसा आज हिन्दी का है. शुरू से अन्त तक सभी काम उर्दू लिपि और उर्दू भाषा में ही किए जाते थे. और मैं इन दोनों में लगभग कोरा था. हिन्दुस्तान से चलने से पहले कई बार दिल में आया था कि फील्डन से इस बारे में खुलकर बात करूँ, लेकिन लंदन और युद्ध को निकट से देखने का चाव मुझे रोकता रहा.
दो-तीन अनाउन्सर वहां पहले से पहुंच चुके थे. सभी उर्दू के माहिर उस्ताद. वे हिन्दी न जानते थे, न ही उसे गिनती में लाते थे. उर्दू से अन्जान होने के अलावा मेरी एक और कमज़ोरी यह थी कि माइक्रोफ़ोन पर बोलने का तजुर्बा भी मुझे बहुत कम था. फिर, बोलने का लहज़ा इतना ज्यादा पंजाबी कि अपनी पहली रिकार्डिंग सुनकर मेरे अपने कान फटने को आ गए थे. तब मेरा सारा अहंकार मिट्टी में मिल गया कि फील्डन मुझे सेवाग्राम से विशेष रूप से अपने साथ लंदन लाए थे. आख़िर मैं भी उनकी नज़र में खटकने लगा. फिर तो मुझे साफ़ दिखाई देने लगा कि वहाँ मेरा ज्यादा देर टिकना सम्भव नहीं था.
मेरा मन ग़ुस्से आर ग्लानि से भर गया. एक तो, मैंने ख़ुद इस नौकरी की मांग नहीं की थी, बल्कि सारे आश्रमवासियों को नाराज़ और दुखी करके आया था. दूसरे, एक साहित्यकार के तौर पर मेरा कुछ महत्व था. मैं हिन्दी के पहली श्रेणी के कहानीकारों में गिना जाता था. मेरी कई रचनाएं उर्दू में अनूदित होकर अदबे लतीफ़ जैसी प्रसिद्ध पत्रिकाओं में छप चुकी थीं. इस सब कुछ का क्या कोई महत्त्व नहीं था? क्या हिन्दी भाषा के अपने अधिकार नहीं थे? जिस भाषा में प्रेमचंद, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, यशपाल, बच्चन, सुमित्रानंदन पंत जैसे महान साहित्यकारों ने लिखा हो, उसे इस प्रकार अवहेलना की दृष्टि से देखना क्या पहले दर्जे का अन्याय नहीं था? रहा सवाल पंजाबी लहज़े का. उसे सुधारते कौन सी देर लगती है. किसी की थोड़ी मदद और अभ्यास ही की तो ज़रूरत है.
यह बात मुझे दिन-प्रतिदिन स्पष्ट हो रही थी कि अगर मैंने अपने बचाव के लिए ख़ुद कोई कोशिश न की, तो बिस्तर गोल होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. मैं सारी-सारी रात बिस्तर पर करवटें बदलता सोचता रहता. आख़िर क्या करूँ? क्यों न बीबीसी के डायरेक्टर-जनरल को मिलकर अपना दुख उनके सामने रखूँ और इस घोर अन्याय का पर्दाफाश करूँ. मैं लाइनल फील्डन को मुंह की खिला सकता था. भारत के हिन्दी समर्थकों को उकसाकर उनके लिए अच्छा ख़ासा सिरदर्द पैदा कर सकता था.
लेकिन फिर, मन में दूसरी तरह के विचार मंडराने लगते. मैं गाँधी जी के चरणों से उठकर अंग्रेज़ों के क़दमों में गिरा था. वह कोई मामूली गिरावट नहीं धी और अब शिकायती टट्टू बनना, अपने घर के लड़ाई-झगड़ों को दुश्मन के सामने नंगा करना, उससे न्याय की मांग करना, क्या यह शर्म से डूब मरने वाली बात नहीं होगी. दूसरों की इज़्ज़त उछालते हुए क्या मेरी इज्ज़त रह जाएगी? इससे देश का अपमान न होगा? अंग्रेज़ अफ़सरों को मुंह मागी मुराद नहीं मिल जाएगी? हमारी अनबन का वे पूरा लाभ नहीं उठाएँगे? फिर, लाइनल फील्डन आम अंग्रेज़ अफ़सरों जैसे नहीं थे. वे गाँधी के भक्त थे, और हिन्दुस्तान की आज़ादी के सच्चे चाहवान. वे वाइसराय तक को नाराज़ करके इस ख़याल से मुझे अपने साथ ले गए थे कि मेरा व्यक्तित्व आम जी-हुजूरी करने वाले सरकारी कर्मचारियों से कुछ अलग होगा. क्या ऐसे व्यक्ति के विश्वास को तोड़ना उचित होगा?
एक दिन में कैंटीन में कॉफ़ी पी रहे अपने साथियों के सामने फूट पड़ा, ‘हिन्दी के हक़ मनवाने का बीड़ा उठाकर मैं भी आप लोगों को उतना ही परेशान कर सकता हूँ जितना इस समय आप मुझे कर रहे हैं. नतीजा हम दोनों के लिए बुरा होगा. फ़ायदा होगा तो सिर्फ़ अंग्रेज़ों का. हमारी कौमी इज्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी. मैं आपके आगे एक प्रार्थना करता हूँ. मगर आप लोग मेरी बेकद्री करना छोड़ दें, बल्कि मेरी मदद करें, तो मैं दिन-रात मेहनत करके थोड़े-से अरसे में ही उर्दू सीख लूँगा. उर्दू मैंने सातवीं जमात तक पढ़ी हुई भी है.’
इस सुझाव का मेरे साथियों पर बहुत अच्छा असर पड़ा. विदेश में प्रत्येक व्यक्ति की राष्ट्रीय भावना जाग उठती है. मेरे साथियों ने महसूस किया कि मैंने अच्छी और सही बात की थी. उसी दिन से उनके साथ मेरे सम्बन्ध अच्छे बन गए. सबने दिल खोलकर मेरी मदद करनी शुरू कर दी. दो-तीन महीनों में ही उर्दू में अच्छी तरह अपना काम करने लगा. पूरे चार साल मैं वहाँ रहा. इस अरसे में कभी एक बार भी अंग्रेज़ हमें एक-दूसरे के प्रति न भड़का सके. हमारा आपसी प्यार और भाईचारा दूसरे विभागों कं लिए भी एक अच्छा उदाहरण बन गया था. वह समय बहुत अच्छा बीत गया.
उर्दू साहित्य का अध्ययन
उर्दू साहित्य का अध्ययन करने से मेरी आंखें खुल गईं. ऐसे लगा, जैसे कोई खोया हुआ ख़जाना मिल गया हो. मन मेँ समाये सभी बैर-विरोध और गलत धारणाएं ख़त्म हो गईं. कितना विशाल, कितना गौरववान था उर्दू साहित्य. ग़ालिब की ग़ज़लें पढ़ते हुए ऐसे लगता है, जैसे मेरी आत्मा पर कोई नया सूर्योदय हो रहा हो. इसी प्रकार अद्वितीय और अविस्मरणीय आनंद कॉलेज के ज़माने में शैली की रचना प्रोमीथियस अनबाउंड और शेक्सपीयर का नाटक हेनरी फ़ोर्थ– भाग पहला पढ़कर आया था. ऐसी अनुभूतियां जीवन की पूंजी बन जाती हैं.




मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

संसदीय राजभाषा निरीक्षण समिति -ध्यान देने योग्य बातें



*संसदीय राजभाषा समिति निरीक्षण : राजभाषा अधिकारी मित्रों के विशेष ध्यानार्थ*

• निरीक्षण संबंधी सूचना प्राप्त होते ही कार्यालय प्रधान के ध्यान में लाते हुए उच्च नियंत्रक कार्यालय और प्रधान कार्यालय को तत्काल अवगत कराना होगा।

• निरीक्षणाधीन शाखा/कार्यालय के स्टाफ़ सदस्यों की बैठक बुलाकर निरीक्षण संबंधी सूचना प्रणाली से अवगत कराकर, अपेक्षित सूचना प्रस्तुत करने हेतु उन्हें लिखित पत्र जारी करने होंगे।

• सामान्य व्यवस्था संबंधी ज़िम्मा राजभाषा अधिकारी न लें। कर्तव्यों का आबंटन हो।

• राजभाषा अधिकारी का ध्यान प्रश्नावली की सही/स्पष्ट प्रस्तुति, आधारभूत सामग्री का संकलन, अभिलेखों का अद्यतन, प्रदर्शनी सामग्री की तैयारी इत्यादि पर हो।

• संसदीय राजभाषा समिति कार्यालय को भरी गई प्रश्नावली प्रस्तुत करने के पूर्व प्रधान कार्यालय का अनुमोदन प्राप्त करना अनिवार्य है।

• स्वतः निर्णय न लें। निरीक्षण संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी का सक्षम प्राधिकारी से लिखित अनुमोदन अवश्य प्राप्त करना होगा।
संयोजक कार्यालय और प्रधान कार्यालय से प्राप्त मार्गदर्शन एवं निर्देशों पर विशेष ध्यान देना होगा।

• निरीक्षण संबंधी संयोजक कार्यालय और ज़रूरतानुसार संसदीय राजभाषा समिति कार्यालय के समन्वयक अधिकारी तथा अपने प्रधान कार्यालय से संपर्क में रहना होगा।

• प्रश्नावली भरने में त्रुटि न हो।जोड-घट, समरूप प्रश्नों के लिए अलग अलग उत्तर,  अंग्रेज़ी-हिन्दी पाठ में समानता न होना, अंग्रेज़ी की तुलना में हिंदी फांट का आकार कम होना, …. चिह्न के बजाए रु. लिखना इत्यादि।

• ऊपरी दिखावट न हो। उपलब्ध अभिलेखों एवं कृत कार्रवाई के अनुसार जानकारी प्रस्तुत करनी होगी।

• गत निरीक्षण के आंकड़े कोष्ठक में देने होंगे।

• समाधान की पंक्तियाँ स्पष्ट और शालीनता पूर्ण हों।(जी हाँ, जी नहीं…..)

• ‘प्रयासरत, प्रयत्नशील, कार्य प्रगति पर’  इत्यादि शब्दों/वाक्यों का प्रयोग न करते हुए वस्तुस्थिति से संक्षेप में अवगत कराना होगा।

• देखना होगा कि सभी अनुबंध स्पष्टत: तैयार कर संलग्न किए गए हैं।

• कार्यालय प्रमुख को सभी प्रश्नों और उत्तरों से स्पष्टत: अवगत कराना होगा।

• संभाव्य प्रश्नों के उत्तर तैयार कर उनसे भी कार्यालय प्रमुख को अवगत कराना होगा। (हिंदी ज्ञान की स्थिति, स्टाफ़ सदस्यों द्वारा कृत हिंदी कार्य की प्रतिशतता, प्रवीणता आदेश, राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सदस्यों द्वारा हिन्दी में कार्य, हिंदी में डिक्टेशन, मूल पत्राचार में हिंदी, अंग्रेज़ी में प्राप्त पत्रों का उत्तर हिंदी में दिया जाना, शीर्षस्थ बैठकों में हिंदी का प्रयोग, हिंदी सॉफ़्टवेयर,हिन्दी टंकण कार्य की प्रतिशतता, हिंदी पुस्तकालय पर कृत व्यय की प्रतिशतता, हिंदी प्रतियोगिता पुरस्कार राशि, सेवा अभिलेखों में प्रविष्टियाँ, प्रचार सामग्री एवं विज्ञापनों में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं पर कृत व्यय की प्रतिशतता पर अधिक ध्यान दिया जाता है।)

• राजभाषा प्रदर्शनी की व्यवस्था, पावर पाइंट प्रस्तुति (पूर्वानुमति से) पत्रिकाओं/बुलेटिनों/पुस्तकों का विमोचन (पूर्वानुमति से) पर ध्यान देना होगा। 

• आवश्यक समर्थन सामग्री के अभिलेख साथ रखने होंगे। यथा विज्ञापन एवं प्रचार पर कृत व्यय संबंधी पत्र की प्रति, धारा3(3)के पिरलेख, तिमाही रिपोर्ट, बैठकों के कार्यवृत्त, रोस्टर, अनुदेश पुस्तिकाएँ, प्रक्रिया साहित्य, प्रमुख प्रपत्र, प्रेस विज्ञप्ति इत्यादि।
                   *********
(साभार- डॉ वी व्यंकटेश्वर राव)

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2019

पसायदान

संत ज्ञानेश्रर जी ने ज्ञानेश्वरी ग्रंथ अर्थात "सटीक भावार्थ दीपिका"  पूर्ण करने के उपरांत ईश्वर को जो प्रार्थना लिखी थी,उसे 'पसायदान' से मराठी विश्व में ख्याति प्राप्त हुई है। अत्यंत कष्टदायी जीवन बिताने पर गीता ग्रंथ पर सटीक विवरण प्राकृत मराठी में लिखा। संन्यासी के पुत्र के नाम से जाति से बहिष्कृत किया गया। सनातन धर्म की ज्योत प्रज्वलित करके आम लोगों में ज्ञान गंगा प्रवाहित की। तत्कालीन आसान प्राकृत भाषा में गीता का ज्ञान प्रवाहित किया जो वर्षों से संस्कृत भाषा की मर्यादा में बंधा हुआ था।संत ज्ञानेश्वर संतों में क्रांतिकारक संत थे जिहोंने दीन दुखी आम लोगों के लिए धार्मिक कार्य किया। मराठी के प्रथम आद्य कवि, अनुवादक, समीक्षक, मार्गदर्शक संत ज्ञानेश्वर के चरणों पर  पसायदान का हिंदी अनुवाद सविनय सादर प्रस्तुत है। मेरी अल्प बुद्धि से यह अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ।इस अनुवाद की समीक्षा,सुधार हेतु हिंदी लेखिका कवियत्री डॉडॉ. अन्नपूर्णा सिंह जी हार्दिक धन्यवाद।

*पसायदान*

विश्वरचयिता ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ
मेरे वाक यज्ञ से संतुष्ट होकर
मुझे अनुग्रहित करके प्रसाद प्रदान करें। (1)
दुष्टों की दुर्भावना का अंत हो,
सत्कर्म के प्रति दुष्टों की आस्था बढ़े
विश्व में मित्र भाव प्रवाहित होकर
सभी जीवों में मित्रता बढ़े । (2)
पापी के मन का अज्ञान रुपी अंधकार दूर हो
विश्व में स्वधर्म रुपी उषा काल हो
सभी जीवों की मंगल मनोकामनाएँ पूर्ण हो (3)
सर्वत्र मंगल वृष्टि से
 सकल विश्व को पुलकित करनेवाले
ईश्वरनिष्ठ   संत
 सभी जीवों पर कृपा करें (4)
वे सभी सुसंवादी  संत कल्पतरु समान
 उद्यान हैं
चेतनारूपी  चिंतामणी रत्नों के पुर हैं
अमृत स्वर की गर्जना करनेवाले समुद्र हैं (5)
बेदाग पूर्णिमा के चंद्र और
ताप रहित सूर्य के समान संत सज्जन
सभी जीवों के मित्र हो जाएं  (6)

त्रिलोकों में सर्व सुख सम्पन्न पूर्ण होकर
विश्व के आदि पुरुष की सेवा करें (7)
यह ग्रंथ जिनका जीवन है
वे इस विश्व के दृश्य और अदृश्य
भोग पर विजय प्राप्त करें (8)
इति विश्वेश्वर गुरु श्री निवृत्तिनाथ
आशीर्वाद देकर  बोले
यह प्रसाद तुझे प्राप्त हो
यह वर पाकर ज्ञानदेव सुखी हो गया (9)

ज्योतिबा

(समाज सुधारक और देश में नारी को शिक्षा देने के लिए पहला  स्कूल पुणे में खोलने वाले ज्योतिबा फुले पर लिखी गयी मराठी कविता का हिंदी अनुवाद)  ----

ज्योतिबा
धन्यवाद।
आप  उसे
दहलीज के
बाहर ले आये,
क ख ग घ
त थ द ध
पढ़ाया
और
कितना बदलाव आया है ,
अब उसे
दस्तख़त के लिए
बायी अंगुली पर
स्याही लगानी नहीं पड़ती ,
अब वह स्वयं
लिख सकती है .........
मिटटी का तेल स्वयं पर
छिड़कने  से पहले
( उसके पीछे रहनेवाले बच्चों को ध्यान में रखकर)
" मैं अपनी मर्जी से
जल कर ख़ाक हो रही हूँ "
------------------------------------------------------------------
(मराठी कवि - अशोक नायगांवकर )
हिंदी अनुवाद- विजय नगरकर

अब इस गांधी का क्या करें ?

अब इस गांधी का क्या करें ?😊    (कविता)    **************************

जलाने पर भी दहन नहीं हो रहा               
खत्म करने पर भी  खत्म नहीं हो रहा ,
 हत्या करके भी मर नहीं रहा
   इस गांधी का अब क्या करें?

  मूर्ति तोड़ने पर भी
   अभंग है
   बदनामी के सैलाब में भी
   अचल है
                                       
बदनामी के चक्रवात में                           .              जनमानस में अमर है,
 
चरित्र के साथ  खूब खिलवाड़ किया                                                                             विचारों से भटका दिया,
केसरिया रंग में  पोत दिया

   थक गया हूँ इस 70 सालों से
     अब हम करें तो क्या करें ?                                                                                अब इस गांधी का क्या करें?     
                                                                            कितनी बार पेड़ काटें?       
  जड़े फिर भी जमीन के अंदर
 फैल रही है हर दिशा में
                                                                                             
खत्म हुआ
कहते कहते
चर्चा के चक्रवात में   
  घूम रहे है,
उसके विचार बार बार
   बापू, तेरा नाम पोछने पर भी
 उजागर हो रहा है।

   हम  अब इस 70 सालों में
जमीन के अंदर
धंस   गए है
  पिछले 70 सालों से
एक ही सवाल
   इस गांधी का अब क्या करें ? ***************************.   
 मूल मराठी कविता - हेरंब कुलकर्णी  (8208589195 )

(हिंदी अनुवाद- विजय प्रभाकर नगरकर)

आई

 मराठी कविता "आई"

माँ एक नाम है
अपने आप भरा पूरा
 घर में जैसे एक गाँव है,
सभी में मौजूद रहती है
अब इस दुनिया से दूर है
लेकिन कोई मानता नहीं।
मेला खत्म हुआ, दुकानें उठ गई
परदेस में क्यों आंखे नम हुई,
माँ हर दिल में कुछ यादें छोड़ जाती है
हर दिल जानता है माँ का दिल,
घर में जब दीप जले
कोई नहीं देखता उसे
अंधरे में जब वह बुझ जाती है
तब समूचे मैदान में दिशाहीन
मन उसके लिए दौड़ता है,
कितनी फसलें , कितने फासले
मिट्टी की प्यास कब बुझ पाई है।
कितना खोदा है माटी को बार बार
नजर आता है कुआं
मन के गहरे पाताल में,
इससे क्या अलग है माँ?
घर जब वह मौजूद नहीं
किसके लिए गोशाला में गाय  व्याकुल है

माँ का नाम क्या है
बच्चों की माँ है
बछड़ों की गाय है
दूध का माखन है
लंगड़े का पैर है
धरती का आधार है
माँ है जन्म जन्मांतर की रोटी है
ना कभी खत्म होती है
ना कभी बचती है

मूल मराठी कविता-आई
कवि-फ मु शिंदे
हिंदी अनुवाद-विजय नगरकर

"अपूर्ण कविता"

■ "अपूर्ण कविता"

स्कूल छूटने की बेल की आवाज
हवा में गूँज  ही रही थी तब
मैं मशीन की गति से
घर पहुंचा था,
पीठ पर लटका बस्ता फेंक
घोड़े जैसा दौड़ कर
पहुँच जाता था खेल के मैदान में
मस्तमौला बैल सा
धूल मिट्टी में नहाकर
इतराता था अपने मर्द होनेपर
वो भी आती थी स्कूल से
घर के चार मटकियां पानी से भर
घर आंगन बुहारकर
देवघर में ज्योत जगाकर
वह बनाती थी रोटी
मां जैसी गोल गोल
और राह निहारती देहरी पर
माँ के लौटने तक जंगल से,

वह चित्र निकालती थी
और रंगोली सजाती
घर के आंगन में
मीरा के भजन और
पुस्तक की कविताएं
गाती थी मीठे स्वर में

बर्तन मांजना, कूड़ा कचरा बीनना
आँगन बुहारना,
और न जाने कितने काम
वह करती रही
मैं हाथ पांव पसारकर
सो जाता था
वह किताबे लेकर बैठती थी
दीपक की रोशनी में देर तक

एक ही कक्षा में थे हम
गुरुजी कान मरोड़कर
या कभी शब्दों की फटकार से
मुझे उपदेश देते
" तेरी बड़ी बहन जैसा बनेगा तो
जीवन सुधर जाएगा तेरा "
मैं दीदी की शिकायत करता था माँ के पास
मैट्रिक का पहाड़
पार किया मैंने फूलती साँस लेकर
उसने अच्छे अंक हासिल किए थे
बापू ने कहा
मैं दोनों का खर्चा नहीं उठा पाऊंगा
आंख का पानी छुपाकर
उसने कहा था
भैया को आगे पढ़ने दीजिए
उसके  बाद जन्मे भाई के
  रास्ते से  चुपचाप हटकर
वह बनाती गई उपले
माँ के साथ खेती का काम करती
काँटे झाड़ी हटाती गई
नारी बनकर अंदर ही अंदर
टूटती गई,
उसके भाग्य का कौर चुराकर
मैं आगे बढ़ता गया
किताबों की राह पर,

 मैं बात जान गया
दिल में टिस रह गयी
उसने आंख का पानी
क्यों छुपाया था,
उसको ब्याह कर
बापू आज़ाद हुए
माँ की जिम्मेदारी खत्म हुई
अभी तक मेरा मन
अपराधी है अव्यक्त बोझ तले,

भैयादूज, रक्षा  बंधन के दिन
दीदी मायके आती रही
सहर्ष सगर्व
छोटे भाईके वैभव देख कर
हर्ष विभोर होती रही
बुरी नजर उतारती रही
भारी आंखों से आरती उतारती रही
ससुराल लौटते हुए
छोटे भाई को देती रही अशेष आशीष,

उसके जाने के बाद
मेरा मन जलता रहा दीपक समान
जिसकी रोशनी में
वह पढ़ती थी किताबें
और कविताएँ
उसकी कविता
मेरे लिए
रही अपूर्ण।
■■
हिंदी अनुवाद- विजय नगरकर।
मूल मराठी कविता - पुनीत मातकर | गडचिरोली |  7039921832

बुधवार, 12 जून 2019

पसायदान


संत ज्ञानेश्रर जी ने ज्ञानेश्वरी ग्रंथ अर्थात "सटीक भावार्थ दीपिका"  पूर्ण करने के उपरांत ईश्वर को जो प्रार्थना लिखी थी,उसे 'पसायदान' से मराठी विश्व में ख्याति प्राप्त हुई है। अत्यंत कष्टदायी जीवन बिताने पर गीता ग्रंथ पर सटीक विवरण प्राकृत मराठी में लिखा। संन्यासी के पुत्र के नाम से जाति से बहिष्कृत किया गया। सनातन धर्म की ज्योत प्रज्वलित करके आम लोगों में ज्ञान गंगा प्रवाहित की। तत्कालीन आसान प्राकृत भाषा में गीता का ज्ञान प्रवाहित किया जो वर्षों से संस्कृत भाषा की मर्यादा में बंधा हुआ था।संत ज्ञानेश्वर संतों में क्रांतिकारक संत थे जिहोंने दीन दुखी आम लोगों के लिए धार्मिक कार्य किया। मराठी के प्रथम आद्य कवि, अनुवादक, समीक्षक, मार्गदर्शक संत ज्ञानेश्वर के चरणों पर  पसायदान का हिंदी अनुवाद सविनय सादर प्रस्तुत है। मेरी अल्प बुद्धि से यह अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ।इस अनुवाद की समीक्षा,सुधार हेतु हिंदी लेखिका कवियत्री डॉडॉ. अन्नपूर्णा सिंह जी हार्दिक धन्यवाद।

*पसायदान*

विश्वरचयिता ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ
मेरे वाक यज्ञ से संतुष्ट होकर
मुझे अनुग्रहित करके प्रसाद प्रदान करें। (1)
दुष्टों की दुर्भावना का अंत हो,
सत्कर्म के प्रति दुष्टों की आस्था बढ़े
विश्व में मित्र भाव प्रवाहित होकर
सभी जीवों में मित्रता बढ़े । (2)
पापी के मन का अज्ञान रुपी अंधकार दूर हो
विश्व में स्वधर्म रुपी उषा काल हो
सभी जीवों की मंगल मनोकामनाएँ पूर्ण हो (3)
सर्वत्र मंगल वृष्टि से
सकल विश्व को पुलकित करनेवाले
ईश्वरनिष्ठ   संत
सभी जीवों पर कृपा करें (4)
वे सभी सुसंवादी  संत कल्पतरु समान
उद्यान हैं
चेतनारूपी  चिंतामणी रत्नों के पुर हैं
अमृत स्वर की गर्जना करनेवाले समुद्र हैं (5)
बेदाग पूर्णिमा के चंद्र और
ताप रहित सूर्य के समान संत सज्जन
सभी जीवों के मित्र हो जाएं  (6)

त्रिलोकों में सर्व सुख सम्पन्न पूर्ण होकर
विश्व के आदि पुरुष की सेवा करें (7)
यह ग्रंथ जिनका जीवन है
वे इस विश्व के दृश्य और अदृश्य
भोग पर विजय प्राप्त करें (8)
इति विश्वेश्वर गुरु श्री निवृत्तिनाथ
आशीर्वाद देकर  बोले
यह प्रसाद तुझे प्राप्त हो
यह वर पाकर ज्ञानदेव सुखी हो गया (9)

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

अमेरिकन प्रोजेक्ट में हिंदी

The Gateway to Educational Material (GEM) यह अमेरिकन सरकार का प्रोजेक्ट है जो सिराकस यूनिवर्सिटी को दिया गया था।तब कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी भाषा ने नया कदम रखा था।
    मुझे यह देखकर अत्यंत आश्चर्य हुआ था कि इस अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट में हिंदी भाषा को शामिल नहीं किया था। विश्व की अनेक भाषाओं की जानकारी लिंक सहित वहां उपलब्ध थी।मुझे यह बात हजम नहीं हुई कि हिंदी सर्च करने पर वहाँ निल रिपोर्ट आ रही थी।
    मैंने इस प्रोजेक्ट में हिंदी भाषा संबंधित वेब पेजेस, भारत सरकार के प्रोजेक्ट,हिंदी सॉफ्टवेयर आदि विस्तृत जानकारी लिंक सहित अमेरिकन प्रोजेक्ट को प्रदान की थी।
  मेरे इस योगदान को अमेरिकन प्रोजेक्ट ने स्वीकार की थी।उसकी परिवर्तन नीति में मेरी स्वीकृति ली गई थी।
  मेरे लिए यह गौरव की बात थी।
मैं हर बार पुणे जाता तो सी डैक जरूर जाता था।वहां हिंदी विभाग के साइंटिफिक ऑफिसर से संपर्क करता था।मेरे मन में हिंदी और  सूचना प्रौद्योगिकी को लेकर रोमांचक उत्साह था।
    इसके बाद मैंने हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी के अभ्यास में कार्यरत रहा।

(नोट-मेरा पहला सरनेम "कांबळे"था जो बाद में "नगरकर"में गैज़ेट द्वारा परिवर्तित किया गया।)

मी तुला अर्पण करून जाईल

मी माझे सर्वस्व तुला अर्पण करून निरोप घेईल मुलांनो, मी  माझी विनम्रता गिळंकृत केली आहे मी माझी बनावट संपत्ती तुम्हाला वारस  ठेऊन जात आहे मी ...