मैंने भैंस के बारे में कुछ कहावतें सुनी थी जैसे
*काला अक्षर भैंस बराबर*
*जिसकी लाठी उसकी भैंस*
*गई भैंस पानी में*
* भैंस के आगे बीन बजाना*
*भैंस बैठ पगुराये*
* भैंस पूछ उठाएगी तो गाना नहीं गाएगी गोबर करेगी*
*दुधैल गाय की लात भली लगती है*
भैंस पर कुछ मजेदार कविताएं भी लिखी गई है ।हास्य ललित निबंध भी पढ़े हैं।
लेकिन मुझे तब आश्चर्य हुआ जब मेरे शहर के एक गरीब ग्वाला मित्र दिलीप शहापुरकर ने भैंस विषय पर गंभीर संवेदनशील काव्य संग्रह "महिषायण" लिखा है। यह ग्वाला समाज का एक रामायण ही है।
आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण अब तक उसका मराठी काव्य संग्रह अप्रकाशित है। यह बात करीब 25 साल पुरानी है। आज पुराना रेकॉर्ड देखते समय कुछ कविताएं हाथ लगी। उसके आग्रह पर मैंने उस संग्रह का हिंदी अनुवाद भी किया है। उसे कुछ पैसे भी दिए थे। पता नहीं वह कब प्रकाशित होगा। दिलीप एक संवेदनशील मराठी कवि और बेहतरीन चित्रकार भी है। उसने भैंस पर अनेक विविध तरह के कलात्मक चित्र निकाले हैं।
पारिवारिक जिम्मेदारी और आर्थिक विपत्ति के दिनों में न जाने कितने लेखक, कवि, चित्रकार, रंगमंच कलाकार की प्रतिभा कुचल गई है। जिंदगी से समझौता करते हुए कितने लोग फिसल गए है। दुःख होता है जब अनेक कलाकार विपन्न परिस्थिति से संघर्ष करते हुए जी रहे है। समय का पहिया अजीब तरह से घूमता है।
काल की महिमा अपरंपार है।प्रतिभा होते हुए भी हम खुलकर कोई गीत गा नहीं सकते।कभी रंगमंच पर अपने अभिनय के कौशल दिखा नहीं पाते। कभी हमारी कविता के फूल खिलकर भी मुरझा जाते हैं।
अनुवाद करते समय मूल भाषा की विशेष शब्दावली, सांस्कृतिक संदर्भ ध्यान में रखने पड़ते है। कुछ अज्ञात शब्दों का सामना हो जाता है जैसे एक शब्द था "जानी"। पूछने पर दिलीप ने कहां कि "हमारे समाज में हर परिवार में एक जानी गाय, भैंस होती है। उसे हम एक पूंजी समझकर पालते है। उसे अन्य गाय,भैंस से अलग रखते है। उसका दूध हमें पूजनीय होता है। उस दूध की बिक्री नहीं की जाती। हमारे परिवार के बच्चों को जानी गाय, भैंस का दूध दिया जाता है"
महाराष्ट्र में हर दिवाली के वर्ष प्रतिपदा, पाडवा के दिन "सगर महोत्सव मनाया जाता है। इस दिन गांव के विशाल मैदान में भैंसों, पाड़ों को एकत्रित करके उनकी पूजा की जाती है। भैंस को लक्ष्मी और रेड़ा, भैंसा को यमराज माना जाता है।
मैं इस तरह की प्रथा से अनजान था। हमारे समाज में व्याप्त इन विलक्षण बातों को गहराई से समझना होगा।
अनुवाद करते समय मेरे बांग्ला मित्र, लेखक सुमित पाल ने सहायता की। सुमित ने उर्दू फारसी पर पी. एच.डी. की है। आजकल सुमित के लेख निरंतर देश अनेक सुप्रसिद्ध उर्दू, अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
अनुवाद के कुछ अंश सादर प्रस्तुत है।
" महिषायण"
आप पूजा विधि में
दूध घी का अभिषेक करते है
वहां झोपड़ी में कोई बच्चा
दूध के बिना ही सो जाता है,
हम दूध का दान करते हुए अपना अस्तित्व भूल जाते हैं लेकिन हमारे सूखे पन में
कसाई का घर
मनुष्य हमें दिखाता है ,
संत ज्ञानेश्वर ने
हमारे मुख से
वेद कहलाएं है,
विज्ञान युग ने
हमें गूंगा बनवाया है,
परंपरागत यह रिवाज चला आ रहा है
लोगों के बाजार में हमारा नीलाम होता आ रहा है
हमारे दूध की मात्रा पर
उनका सौदा तय होता है,
तुम हमारे कान कतरते हो
नक्काशीदार
क्योंकि भैंस लगे सुंदर
हम कब तक बर्दाश्त करें
वेदना आप के खातिर,
आप बड़े चालाक धूर्त
हमारे सामने खड़ा कर देते हो हमारे मृत पाड़े का भोत
आप कितने अनुभवी होशियार,
निरंतर हमारा दूध
चुराकर ले जाते है
अपने घर परिवार,
भैंस बरकतदार
गरीबों का तारणहार
इसलिए यह कल्पवृक्ष
खड़ा है हमारे द्वार।
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(मराठी "भोत" का अर्थ मृत पाड़े के शरीर में भूसा भरकर दूध दुहते समय भैंस के सामने रखा जाता है, ताकि उसे चाट कर भैंस दूध दे। पता नहीं इसे हिंदी में क्या कहते है?)
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(प्रकाशनाधीन मराठी
" महिषायण" काव्य संग्रह से साभार।)
मूल मराठी कवि -
दिलीप शहापुरकर
हिंदी अनुवाद -
विजय नगरकर
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