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हिंदी को मराठी संतों की देन

'हिंदी को मराठी संतों की देन' आचार्य विनयमोहन शर्मा द्वारा रचित एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, प्रामाणिक और ऐतिहासिक शोध-ग्रंथ है। इसका प्रथम प्रकाशन वर्ष 1957 में बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना द्वारा किया गया था। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन ने किस प्रकार भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को लांघकर पूरे भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में बांधा था, यह पुस्तक उसका अत्यंत सशक्त और जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करती है। हिंदी साहित्य के इतिहास और अंतर-भाषाई अनुसंधान (Comparative Literature) के क्षेत्र में इस पुस्तक को एक 'मील का पत्थर' माना जाता है। यहाँ पुस्तक की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की जा रही है: 1. पुस्तक की पृष्ठभूमि और प्रेरणा आचार्य विनयमोहन शर्मा जब नागपुर में कार्यरत थे, तब उन्हें महाराष्ट्र के संतों की हिंदी रचनाओं का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ। 1946 में नागपुर में आयोजित 'अखिल भारतीय प्राच्यविद्या-परिषद्' में उन्होंने संत नामदेव की हिंदी कविता पर एक शोध-पत्र प्रस्तुत किया, जिसकी सराहना आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा डॉ. हीरालाल जैन जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने की। इन्हीं विद्वा...

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