हिंदी में एम.ए. करने वाले देश के पहले व्यक्ति

 




डॉ. नलिनीमोहन सान्याल (1861–1951)


हिंदी में एम.ए. करने वाले देश के पहले व्यक्ति

 आधुनिक भारतीय भाषा-साहित्य और भाषाविज्ञान के उन विरल विद्वानों में अग्रगण्य हैं, जिन्होंने भाषाई सीमाओं को तोड़कर अंतर-प्रांतीय बौद्धिक संवाद की सुदृढ़ नींव रखी। मूलतः बांग्लाभाषी होने के बावजूद उन्होंने 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में हिंदी को विश्वविद्यालयी स्तर पर अकादमिक प्रतिष्ठा दिलाने और दक्षिण भारत के क्लासिकल तमिल साहित्य को पूर्वी भारत से जोड़ने में युगांतरकारी भूमिका निभाई।



परिचय एवं जीवन-वृत्त:


डॉ. नलिनीमोहन सान्याल का जन्म 1861 में अविभाजित बंगाल के एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। वे बहुभाषाविद्, प्राच्यविद्या अनुरागी और गहन शोध-दृष्टि वाले शिक्षाविद थे।

तत्कालीन समय में भारतीय भाषाओं (देशी भाषाओं) को उच्च शिक्षा और शोध का माध्यम बनाने की दिशा में कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी ने ऐतिहासिक पहल की थी। उन्होंने 1919-1921 के दौरान विश्वविद्यालय में 'आधुनिक भारतीय भाषा विभाग' (Department of Modern Indian Languages) की स्थापना की। इसी शैक्षणिक पुनर्जागरण के दौर में डॉ. नलिनीमोहन सान्याल ने 1921 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे औपचारिक रूप से हिंदी में एम.ए. करने वाले देश के पहले व्यक्ति बने।


डिग्री प्राप्त करने के बाद वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हुए और जीवनपर्यंत भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन व अध्यापन में सक्रिय रहे। 1951 में 90 वर्ष की सुदीर्घ आयु में उनका देहावसान हुआ।


हिंदी में ऐतिहासिक योगदान:


20वीं सदी के प्रारंभ में हिंदी को उच्च अकादमिक हलकों में 'साहित्यिक व शोधपरक भाषा' के रूप में स्थापित करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। ऐसे समय में डॉ. सान्याल का योगदान कई स्तरों पर मील का पत्थर साबित हुआ:


  संस्थागत मान्यता: जब तक किसी भाषा में स्नातकोत्तर अध्ययन और शोध की व्यवस्था न हो, उसे वैश्विक अकादमिक मान्यता नहीं मिलती। डॉ. सान्याल ने प्रथम छात्र बनकर इस मार्ग का उद्घाटन किया और बाद में प्राध्यापक के रूप में पाठ्यक्रम निर्माण और शोध-पद्धति को विकसित किया।


  तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Philology): उन्होंने हिंदी, बांग्ला, प्राकृत और अपभ्रंश के अंतर्संबंधों पर वैज्ञानिक दृष्टि से कार्य किया। उनका मानना था कि उत्तर भारतीय आधुनिक आर्य भाषाओं का विकास एक साझे स्रोत से हुआ है, इसलिए उनके व्याकरण और शब्द-भंडार का अध्ययन तुलनात्मक होना चाहिए।


  मध्यकालीन काव्य का अनुशीलन: उन्होंने रीतिकाल और भक्तिकाल के कवियों—विशेष रूप से बिहारीलाल (बिहारी सतसई), तुलसीदास और कबीर—के साहित्य का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया तथा गैर-हिंदी भाषियों के लिए इन ग्रंथों की बोधगम्य व्याख्याएं तैयार कीं।


प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ:


डॉ. सान्याल की लेखनी बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में समान अधिकार से चलती थी। उनकी प्रमुख रचनाएं और अनुवाद कार्य निम्नलिखित हैं:


 तिरुक्कुरल (Tirukkural / কুরল) 1939 (बांग्ला) संत तिरुवल्लुवर रचित तमिल नीति-ग्रंथ 'तिरुक्कुरल' का मूल तमिल से बांग्ला में प्रथम प्रामाणिक पद्य/गद्य अनुवाद, विस्तृत भूमिका एवं सांस्कृतिक व्याख्या सहित। 


 बिहारी सतसई अनुशीलन हिंदी / बांग्ला महाकवि बिहारी के दोहों का तुलनात्मक और रस-शास्त्रीय अध्ययन। 


 हिंदी साहित्य का इतिहास एवं भाषा-प्रवृत्तियाँ अकादमिक शोध-आलेख कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध-निबंध, जिनमें अपभ्रंश से पुरानी हिंदी के विकास पर विमर्श है। 



 भाषातत्व ओ भारतीय आर्यभाषा बांग्ला आधुनिक भारतीय भाषाओं के ध्वनि-परिवर्तन और व्याकरणिक संरचना पर केंद्रित भाषावैज्ञानिक कार्य। 



'तिरुक्कुरल' के अनुवाद का ऐतिहासिक संदर्भ


1939 में प्रकाशित उनका 'तिरुक्कुरल' अनुवाद भारतीय अनुवाद-परंपरा की दुर्लभ उपलब्धि है। उस काल में प्रायः दक्षिण भारतीय भाषाओं के ग्रंथों का अनुवाद अंग्रेजी माध्यम से होता था, किंतु डॉ. सान्याल ने प्राचीन तमिल के इस ग्रंथ के मर्म को समझकर सीधे बांग्ला पाठकों तक पहुँचाया। यह कार्य न केवल भाषाई सेतु बना, बल्कि 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' की साहित्यिक अवधारणा का प्रारंभिक उदाहरण भी बना।



पुरस्कार एवं सम्मान:


डॉ. सान्याल उस दौर के विद्वान थे जब राजकीय सम्मानों की जगह अकादमिक सभाओं की मान्यता सर्वोच्च मानी जाती थी:

  कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा सम्मान: स्नातकोत्तर स्तर पर सर्वोच्च प्रदर्शन और हिंदी विभाग के विकास में आजीवन योगदान के लिए विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषदों द्वारा समादृत।

  बंगीय साहित्य परिषद सम्मान: तमिल साहित्य और भाषाविज्ञान पर उनके कार्यों के लिए बंगाल की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था 'बंगीय साहित्य परिषद' (Vangiya Sahitya Parishad) द्वारा प्रशस्ति।

  हिंदी संस्थाओं द्वारा समादर: काशी नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) के अधिवेशनों में एक हिंदीतर भाषी मनीषी के रूप में उनके योगदान को सार्वजनिक रूप से सराहा गया और उन्हें 'विद्वत-रत्न' के रूप में प्रतिष्ठा दी गई।



हिंदीतर भाषिक विद्वान के रूप में प्रासंगिकता:


डॉ. नलिनीमोहन सान्याल का व्यक्तित्व इस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त करता है कि हिंदी का संवर्धन केवल हिंदी-भाषी क्षेत्रों (मध्यदेश) के लोगों ने किया। उनका कृतित्व रेखांकित करता है कि:

  राष्ट्रीय दृष्टि: बंगाल में रहते हुए हिंदी को राष्ट्र की संपर्क भाषा और उच्च विमर्श की भाषा के रूप में देखना उनकी व्यापक राष्ट्रीय चेतना का परिचायक था।

  त्रि-वेणी संगम (तमिल-हिंदी-बांग्ला): एक बंगाली विद्वान, जो हिंदी में देश का पहला एम.ए. बनता है और प्राचीन तमिल साहित्य का बांग्ला में प्रथम अनुवाद करता है—यह भारतीय भाषा-परिवार के आंतरिक जुड़ाव का सबसे सशक्त प्रमाण है।

  अकादमिक निष्पक्षता: क्षेत्रीय भाषाई संकीर्णता से ऊपर उठकर उन्होंने ज्ञान को सर्वोपरि माना।

डॉ. नलिनीमोहन सान्याल केवल हिंदी के प्रथम एम.ए. डिग्रीधारी ही नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत में बहुभाषिकता, राष्ट्रीय समन्वय और तुलनात्मक साहित्य के अग्रदूत थे, जिनका स्मरण आ

ज के भाषाई विमर्श में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।


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