तुम्हें अंग्रेज़ी क्यों आती है?
तुम्हें अंग्रेज़ी क्यों आती है?
मुंबई की एक चिपचिपी दोपहर थी। बाहर समंदर की हवा में भी पसीना था और अंदर ई-साहित्य की छोटी सी टीम के दफ्तर में एक बड़े मेहमान का इंतज़ार।
मेहमान कोई आम नहीं। नाम - जे. अलन बर्ड। कभी IBM के डायरेक्टर, कभी CISCO के डायरेक्टर, और अब W3C के लिए दुनिया भर में घूम-घूम कर डिजिटल पब्लिकेशन का स्टैंडर्ड तय करने वाले आदमी। यूनेस्को और C-DAC के बुलावे पर भारत आए हैं। सौ से ज़्यादा देश देख चुके हैं। भाषाओं का डिजिटायजेशन कैसे हो रहा है, यह देखने निकले हैं।
और हम? हम उन्हें मराठी ई-साहित्य दिखा रहे थे।
बातों-बातों में बात निकली, "हमारे यहाँ बच्चे अब बालवाड़ी से ही इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं।"
बस। यहीं पर गड़बड़ हो गई।
सौ देश घूम चुका आदमी, जिसने दुनिया के हर तरह के फॉन्ट, हर तरह की लिपि, हर तरह की टेक्नोलॉजी देखी है, वह एकदम ठिठक गया। उसके चेहरे पर वैसा ही भाव था जैसा किसी को बताया जाए कि यहाँ बच्चे पैदा होते ही साइकिल चलाना शुरू कर देते हैं।
उसे समझ ही नहीं आया। उसने दो-तीन बार पूछा, "मतलब? मतलब घर में मराठी, बाहर मराठी, दोस्त मराठी, माँ मराठी में डाँटती है, पर स्कूल में A for Apple?"
हमने गर्व से कहा, "हाँ।"
वह सच में थक्क रह गया। उसने कहा, "मैंने सौ से ज़्यादा देश देखे हैं। जापान में बच्चे जापानी में पढ़ते हैं, जर्मनी में जर्मन में, फ्रांस में फ्रेंच में। इंग्लैंड में भी बच्चे अंग्रेज़ी में ही पढ़ते हैं क्योंकि उनकी माँ भी अंग्रेज़ी में ही डाँटती है। दुनिया में शायद यह एक ही देश होगा जहाँ बच्चा अपनी माँ की भाषा में रोना सीखने से पहले दूसरी भाषा में 'May I go to toilet' कहना सीखता है।"
हमें लगा वह हमारी तारीफ कर रहा है। हम और अकड़ गए।
फिर दूसरा किस्सा शुरू हुआ।
हम चार लोग थे। दो को अंग्रेज़ी नहीं आती थी, दो फर्राटे से अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे। उसी पर चर्चा चल पड़ी।
बर्ड साहब ने उन दोनों की तरफ देखा जिन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थी और कहा, "मुझे इन पर बिल्कुल आश्चर्य नहीं होता। यह तो एकदम स्वाभाविक है। ये महाराष्ट्र में रहते हैं, मराठी में सोचते हैं, मराठी में सपने देखते हैं। इन्हें मराठी आती है, यही नॉर्मल है।"
फिर उसने हम अंग्रेज़ी बोलने वालों की तरफ देखा और बहुत मासूमियत से पूछा, "मुझे आश्चर्य तुम दोनों पर हो रहा है। तुम्हें अंग्रेज़ी क्यों आती है?"
कमरा सन्न।
यह सवाल किसी ने आज तक हमसे नहीं पूछा था। हमें हमेशा पूछा गया है, "तुम्हें अंग्रेज़ी क्यों नहीं आती?" नौकरी में, इंटरव्यू में, शादी-ब्याह में। पहली बार किसी ने उल्टा पूछ लिया था।
और सच कहें तो इसका जवाब हमारे पास भी नहीं था।
हम क्या कहते? कि हमारे माँ-बाप ने लाइन में लग कर, डोनेशन देकर, पहचान लगा कर हमारा एडमिशन इंग्लिश मीडियम में कराया था? कि तीन साल के बच्चे का इंटरव्यू होता है और उससे पूछा जाता है कि ट्विंकल-ट्विंकल पोएम आती है क्या, और वह बच्चा अगर रो दे तो उसका भविष्य अंधकारमय मान लिया जाता है?
हम क्या कहते कि हमारे यहाँ अंग्रेज़ी भाषा नहीं, स्टेटस है। पुण्य है। मोक्ष का टिकट है। बच्चा अगर फर्राटे से अंग्रेज़ी बोले तो माँ-बाप का सीना वैसे ही फूल जाता है जैसे पहले के जमाने में बेटे के शास्त्री हो जाने पर फूलता था।
बर्ड साहब को कौन समझाए कि हमारे यहाँ बच्चा स्कूल में "Good Morning Teacher" कहता है और घर आकर आजी से "आजी, भूक लागली" कहता है। वह दोनों भाषाओं में सच बोलता है, पर हम एक को ही सच मानते हैं।
असल में व्यंग्य हम पर नहीं, हमारी व्यवस्था पर है।
हम W3C के साथ मिल कर यह तय कर रहे हैं कि मराठी ई-बुक का फॉन्ट कौन सा हो, उसका कोड क्या हो, वह Kindle पर फटे नहीं। हम डिजिटल स्टैंडर्ड बना रहे हैं। पर हमने यह स्टैंडर्ड कभी नहीं बनाया कि बच्चा पहले अपनी ही भाषा में दुनिया को समझे।
बाहर से आया हुआ आदमी, जो टेक्नोलॉजी का आदमी है, वह हमें एक बहुत पुरानी बात याद दिला गया। दुनिया में हर बच्चा पहले अपनी माँ की भाषा में दुनिया को छूता है। हम ही हैं जो उसे पहले अनुवाद करना सिखाते हैं।
वह चला गया। हवाई जहाज में बैठ कर किसी और देश के फॉन्ट को ठीक करने।
पीछे एक सवाल छोड़ गया, जो हमारे ई-साहित्य के सर्वर से भी भारी है।
"तुम्हें अंग्रेज़ी क्यों आती है?"
इस सवाल का जवाब जब तक हम ईमानदारी से नहीं देंगे, तब तक हम कितनी भी ई-पुस्तकें बना लें, हमारी अगली पीढ़ी मराठी ई-पुस्तकें डाउनलोड तो करेगी, पर पढ़ने के लिए उसे पहले गूगल ट्रांसलेट खोलना पड़ेगा।
( सुनील सामंत, संपादक, ई साहित्य मराठी पोर्टल के अनुभव पर आधारित)
~ विजय नगरक
र
अहिल्यानगर, महाराष्ट्र
vpnagarkar@gmail.com
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