बुधवार, 9 मई 2018

हिंदी संगोष्ठी की दावत

*हिंदी संगोष्ठी* 😀😀😀
जिस प्रकार घटिया से घटिया लेख के शीर्षक के आगे सेमिकोलन लगा कर “एक तथ्यपरक अध्ययन” या “एक व्यवहारिक समीक्षा” जैसे ज्ञान-टपकाऊ और प्रज्ञा भड़काऊ शब्द जोड़कर या फिर किसी दो कौड़ी के व्याख्यान के अंत में ट्रक के पीछे लिखे-पढ़े जाने वाले शेर पढ़कर क्रमशः टटपूंजिया लेखक और थर्ड ग्रेड का कंपायमान वक्ता भी आत्ममुग्धता के मोड़ में आ जाता है उसी प्रकार बेसिर-पैर की संगोष्ठी में भी रसना सुखदायी उदरपूजन और घर-परिवार की किच-किच से दूर मध्यम वर्गीय जीवन से कूटे पीसे प्रतिभागी के लिए 3 स्टार होटल में आरामदायक आवास की व्यवस्था कर-करा कर संयोजक सेमिनार को महासफल होने की स्वघोषण कर देता है और इसका प्रमाणपत्र अपने गले में टांग लेता है।

यह दुःखद आश्चर्य है कि मैंने आज तक किसी भी सेमिनार को असफल बताते हुए किसी आयोजक के मुख से नहीं सुना । जिस प्रकार इस देश में कभी कोई पार्टी चुनाव हारती नहीं बल्कि सूपड़ासाफ हार पर भी उसकी नैतिक जीत होती है उसी प्रकार इस देश में कभी कोई सेमिनार न असफल होता है और न कभी होगा ...!! पर हां जे बात है कि सेमिनार के टेक्निकल एक्सपर्टों ने सेमिनार की सफलता के स्तर के अनुपात को प्रीतिभोज में ताज़ा पनीर की नर्माहट, लंबे छरहरे बासमती के पुलाव की गर्माहट और बटर-स्कॉच ऐशक्रीम के चॉकलेटी-मक्खनी स्वाद की मुख-घुलावट तथा sight seeing के लिए वाहन की व्यवस्था में आयोजकों की तत्परता के स्तर की समानुपाती ठहराया है । भोजनावकाश के बाद श्रोताओं को रूम-फ्रेशनर की खुशबू से महकते मंद शीतल वातानुकूलन कक्ष में जगाए रखना आयोजकों के लिए कई बार भ्रष्टाचार की परिभाषा तय करने सा चुनौतीपूर्ण हो जाता है । इस मामले में घाघ सेमिनारी विशेषज्ञ कुछ कोकिलकंठी, कटाराक्षी और मृगनयनी विदुषी ललनाओं का व्याख्यान भोजनाकाश के बाद रसज्ञ श्रोताओं को जगाए रखने के लिए रख छोड़ते हैं । विषय चाहे कितना ही नीरस हो पर सामने का दृश्य नयनभिराम हो तो आदमी पलकों से ना झपकने के लिए भी झगड़ लेता है । इसके विपरीत व्याख्यान चाहे कितना भी अभिनव, टेक्निकल, सूचनापरक क्यों ना हो पर उपरोक्त व्यवस्थाओं में कमी सेमिनार की धज्जियां आयोजकों के पीठ पीछे वैसे ही बखेर देती हैं जैसे हाथीछाप पार्टी के उम्मीदवारों की धज्जियां 2014 के लोकसभा चुनाव में बिखर गईं थी । 🚑

शैक्षणिक सूरमाओं के द्वारा चाहे सेमिनार का आविष्कार किसी भी उद्देश्य के लिए किया गया हो पर इस देश के खुर्राट और हरफ़नमौला खिलाड़ी इसका दोहन बहुमुखी प्रकार से करने में विश्वास रखते हैं । क्योंकि ज्ञान तो आजकल फैसबुक और व्हाट्सएप पर ताबड़तोड़ और अंधाधुंध बरस रहा है पर सेमिनार के बहाने सरकारी दामाद बन गोवा, शिमला या मुन्नार की सैर का आनंद इस परम रसायन का भुक्तभोगी ही जानता है बाकि के अभागे तो केवल उसका कल्पनानंद ही ले सकते हैं । किसी सेमिनार का पत्र आते ही प्राप्तकर्ता के सुमुख से अनायास ही निकल पड़ता है _ चलो भाई , इसी बहाने गोवा/शिमला/मुन्नार की सैर ही हो जाएगी । 🛫

कुछ हिंदी के परमसेवी प्राइवेट भक्त हिंदीभक्ति और नोटभक्ति के संग ईश्वरभक्ति के कलयुगी फ्युजन के तहत 30-35 हजार प्रति भक्त के रेट पर ऐसी संगोष्ठियां तिरुपती बालाजी, जगन्नाथ पुरी या रामेश्वरम में भी आयोजित करा देते हैं क्योंकि देशी हनीमूनी जगहों पर सरकारी हनीमून से अघाए दामादनुमा अधिकारियों का मन लोक के साथ साथ सपरिवार कुछ परलोक सुधार के लिए भी इन तीर्थस्थलों की और भी उन्मुख हो जाया करता है । हिंदीसेवा के साथ साथ बैकुंठ में भी सीट पक्की वो भी सरकारी खर्चे पर ...!!
आज के फैंसी हिन्दीप्रेमी भगतों और हिंदी के प्रभारी पंडों को इससे बढ़कर और क्या चाहिए ...

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✒ डॉ. राकेश शर्मा, गोवा

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