बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

अपनी भाषा का टुटने का दर्द

रुस के कझाकिस्तान और उझबेकिस्तान के सरहद पर हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है। व्यापार व्यवसाय के कारण जैनियों,पंजाबियों एवं उत्तर भारतीयों ने यहां अपना घर बसाया। उनकी भाषाओं के संमिश्रण के कारण रुस में एक नई हिंदी भाषा ने जन्म लिया। इस अनोखे हिंदी पर हिंदी भाषा के विद्वान स्व.भोलानाथ तिवारी जी ने अनुसंधान किया। जिस अनुसंधान के फलस्वरुप उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय ने पी.एच.डी. प्रदान की।
वहां एक जगह पर घुमते हुए उन्होंने देखा कि एक जगह दो रुसी महिलाओं में झगड़ा हो रहा था। एक महिला ने गाली दी जिसपर दूसरी महिला तत्काल फुट कर रो पड़ी। उन्हें अत्यंत आश्चर्य हुआ कि तब उन्होंने अपने रुसी मित्र को पुछा कि वह कौनसी गाली थी जिसपर वह महिला रोने लगी। दो महिलाओं में जब कोई झगड़ा होता है तो भाषा में निखार आ जाता है। उनके मित्र ने कहां कि उस गाली का मतलब है कि “तुने सिखायी हुई भाषा तेरा बच्चा बड़ा होकर उसे भूल जाए ” । तिवारी जी के दिल को इस बात से झंझोड़ दिया क्योंकि वे भाषा विद्वान थे जिन्हें यह मालूम था कि अपनी मातृभाषा से टुटना याने अपने परिवार,समाज और देश से टुट जाना।
अपनी भाषा से टुट जाने का सिलसिला आज तक जारी है आगे भी जारी रहेगा। अब हमें यह सोचना होगा कि संपत्ति, विकास,नाम शोहरत के लिए दूसरी भाषा को हमारे घर परिवार में कितना पूजा जाना चाहिए। कहते है कि आई-टी में अँग्रेजी का ही बोलबाला है। क्या हमें कॉल सेंटर के जरिए विदेशी लोगों की जीवन भर गुलामगिरी ही करनी है या अपने लोगों के लिए भी कुछ करना चाहिए ? जिस परिवार ने हमें पाल पोस कर बड़ा किया उनकी भाषा के प्रति क्या हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता है ?
आज राजनीति में राज ठाकरे अगर यह कहें कि महाराष्ट्र में मराठी का प्रयोग होना चाहिए तो उसमें बूरा क्या है ? लेकिन भाषा आग्रह के लिए हिंसा का सहारा लेना कदापि स्वीकार्य नहीं है। राज ठाकरे कहते है कि महाराष्ट्र में अन्य प्रांतियों का आक्रमण हो रहा है। जिसके कारण मराठी लोगों को नौकरी नहीं मिल रही है। उनके पास मुंबई,पुणे के मॅकडोनल्ड के अधिकारी गए और कहने लगे कि हमारे दुकान की नेमप्लेट अँग्रेजी में है और उसके साथ मराठी को जोड़ना महंगा होगा तब राज ने पुछा कि नामपट्ट महंगा है या आपकी दुकान का माल महंगा है। माल की कीमत की रक्षा करने के लिए क्या आप मराठी का प्रयोग नहीं कर सकते ? कुछ राजनीति की बातों को छोड़ दे तो राज ठाकरे यह भी स्वीकार करते है कि उन्हें अन्य भाषाओं के प्रति कोई घृणा नहीं है। उनका आग्रह मराठी को बढावा देना है। वे कहते है कि पूर्व प्रधान मंत्री स्व.नरसिंह राव जी को अनेक भारतीय भाषाओं का ज्ञान था। अटल जी भी अनेक भाषोओं के ज्ञानी है। सोनिया जी को भी इतालवी के अलावा हिंदी भाषा का भी ज्ञान है।
विस्थापन के कारण अनेक भारतीय लोक दक्षिण अफ्रिका,वेस्ट इंडिज,मॉरिशस आदि देशों में गिरमिटिया बन गए। मतलब यह है कि अँग्रजों ने एग्रीमेंट पर बंधक मजदूर बना दिया। उन्होंने भी विदेशी धरती पर छोटा भारत बना दिया। महात्मा गांधी के प्रथम संग्राम की पृष्ठभूमि भी यही विस्थापित भारतीयों के परिवार की कहानी है जिसे डॉ.गिरिराज किशोर जी ने पहला गिरमिटिया में वर्णन किया है। जब गांधी भारत आए तब कॉंग्रेस की सभा को वे हिंदी में संबोधित करने लगे। उन्होंने लोकमान्य टिळक को अँग्रेजी के बजाय हिंदी में भाषण देने का अनुरोध किया।
विजय प्रभाकर कांबले
राजभाषा अधिकारी भारत संचार निगम लि. अहमदनगर महाराष्ट्र भारत. मोबाईल-०९४२२७२६४०० Email- viprakamble@gmail.com
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