बुधवार, 23 अप्रैल 2008

लाहोर बस

जब बस गुजरती है
बंदुकों की नोक की सुरक्षा में
तब बंटवारे की बहती जख्म
भरने लगती है अश्वत्थामा की जख्म की तरह,

रिश्तों का खुन अपनों को चुबंक की तरह खींच लेता है
बनावटी दीवार ढह जाती है,
मिलन की खुशी में
सरहदें गीली हो जाती है,

मुझे अब नजर आ रही है वाघा सरहद पर
जर्मन में ढह चुके दीवारों की ईटें
बस की चाकों तले
खत्म हो जाएगी नक्शे की कागजी रेखाएँ,

दो क्षितिजो को जोडने वाली बस
जब पूल बनकर गुजरती है
तब उसके नीचे बह जाता है
खुनी हुक्मशाह का इतिहास
आखिर देश बनता है
तलवार की धार के बदले
खून के रिश्तो से ..................


(मुल मराठी कविता - लाहोर बस
मराठी के यूवा कवि - श्री. हेरंब कुलकर्णी ( मोबाईल- 09890748580)
चिरे बंदी, मु.पो.ता. अकोले जि.अहमदनगर, महाराष्ट्र

हिंदी अनुवाद - श्री.विजय प्रभाकर कांबले (मोबाईल- 09422726400 )
प्रभात काँलनी, कलानगर,गुलमोहर रोड
अहमदनगर - 414003 महाराष्ट्र